व्यक्तिगत पूजा

व्यक्तिगत पूजा की अपेक्षा सामूहिक पूजा का अत्यधिक लाभ होता है

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व्यक्तिगत पूजा

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जन्म लेने के बाद हर ब्यक्ति तीन ऋण से बध जाता है जिसमे क्रमश देव पितृ और ऋषि ऋण होते है देव ऋण से उत्तीर्ण होने के लिए तथा मानव जन्म इश्वर ने दिया है इस लिए सत्कार व आदर एवं धन्यवाद के स्वरुप की जाने वाली अर्चना ही ब्याक्तिगत पूजन होती है जो हर ब्यक्ति विविध भाव से विविध देवताओं के माध्यम से करता है किन्तु देव अनेक होते हुवे भी इश्वर एक है सत्यं परम धीमहि इसीलिए भागवत में वेद्ब्यास जी ने वर्णन किया है पूजा का संबंध धर्म, संस्कृति और भगवान से है। कई धर्मों में पूजा की अनेक और लंबी विधियां हैं जबकि कई धर्मों में बड़े ही विश्वास रखते हैं। लेकिन इन सभी धर्मों में पूजा और प्रार्थना पर विशेष बल दिया जाता है।

पूजा का मुख्य उद्देश्य मनोकामनाओं की पूर्ति तथा भौतिक सुख प्राप्त करना होता है। फल प्राप्ति की इच्छा के बिना पूजा करना , यह विचार महाभारत के युद्ध के दौरान स्पष्ट रूप में तब सामने आया जब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया। उनका यही उपदेश श्रीमद भागवत गीता में मौजूद है।

हिन्दू मत के अनुसार सभी प्राणियों में जान होती है और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की प्रक्रिया होती है। यानी जीवन-मृत्यु का चक्र चलता रहता है। माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्माएं एक खास क्रम का हिस्सा बनती हैं और इस क्रम में सबसे ऊपर रहने वाली आत्मा को जन्म-मरण के इस बंधन से मुक्ति मिल जाती है। मुक्ति पाने की कामना ही पूजा की मुख्य वजह है।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही भगवान कृष्ण ने कर्म योग, ज्ञान योग, और भक्ति योग का मार्ग दिखाया।